पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर में रहने वाले सुखदेव मंडल खेती-किसानी करते हैं। इसी से परिवार का खर्च चलता है। इस साल बेटी की शादी करनी है, इसलिए सालभर पहले बैंक से लोन लेकर मवेशी खरीदे। उम्मीद थी कि बकरीद पर बिक जाएंगे और शादी-ब्याह का खर्च निकल जाएगा, लेकिन बंगाल सरकार के एक फैसले ने उनकी उम्मीद तोड़ दी।
13 मई यानी बकरीद से 15 दिन पहले बंगाल सरकार ने एक नोटिस जारी किया। इसमें गोहत्या से जुड़े 1950 के कानून और 2018 के कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा गया कि बिना ‘फिटनेस सर्टिफिकेट’ किसी भी गाय-भैंस की कुर्बानी नहीं दी जाएगी।
इस फैसले के बाद सुखदेव परेशान हैं कि वो मवेशी लेकर कहां जाएं। उनका खर्च कैसे उठाएं और बैंक का लोन कैसे अदा करें। वे कहते हैं, ‘किसी को फांसी देने से पहले भी वक्त मिलता है, हमें वो भी नहीं मिला।‘ 28 मई यानी आज बकरीद है। फैसले से मुस्लिम भी नाखुश हैं। उन्हें कुर्बानी के लिए जानवर नहीं मिल रहे हैं।
कोलकाता के खिदिरपुर में बकरीद पर बकरों और भेड़ों का बाजार लगा। यहां 16 हजार रुपए से लेकर 25 हजार रुपए तक के बकरे बिके।
हिंदू व्यापारी बोले…
दीदी से परेशान होकर सरकार बदली, BJP ने धंधा चौपट किया
बंगाल में पशु हाट बाजारों से करीब 3.7 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी सीधे जुड़ी है। बंगाल में बकरीद पर करीब तीन हफ्ते के लिए पशुओं का बाजार लगता है। इस दौरान करीब ₹2000 से 2,500 करोड़ का व्यापार होता है। सिर्फ कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों में रोज 1 से 2 करोड़ रुपए का कारोबार होता है।
इस काम से जुड़े सुखदेव गुस्से में कहते हैं, ‘सरकार के फैसले ने हमारा व्यापार ठप कर दिया है। इस उम्मीद में बैंकों से लोन लिया था कि कुर्बानी के बाद पैसा भर देंगे। सालभर गाय-भैंस को खिलाया। जब बेचने की बारी आई, तो नया नियम आ गया। अब सरकार ही बताए कि कर्ज कैसे चुकाएं। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और परिवार का खर्च कहां से निकालें।‘
‘दीदी के 15 साल की खराब नीतियों के चलते सरकार बदली। जय श्री राम बोलकर राज्य में नई सरकार लाए, लेकिन अब BJP सरकार की नीतियों ने हमारी परेशानी बढ़ा रखी है। अब लगता है कि शुभेंदु बाबू की सरकार भी बदलनी पड़ेगी।’
पूर्व मेदिनीपुर के शहीद महतो मिनी ब्लॉक में पशु व्यापार से जुड़े परिवार सरकार के फैसले को लेकर गुस्से में दिखे।
पूर्व मेदिनीपुर के सिलीपल्ली मोहल्ले में रहने वाले सुखदेव अकेले नहीं हैं। श्यामल मंडल भी रुंधे गले से यही दिक्कतें गिनाते हैं, ‘बैंक वाले घर पर पैसा लेने आ रहे हैं। गहने गिरवी रखकर पशुओं को पाला। अब इस फैसले से सड़क पर आ गए हैं। अगर सरकार ने साथ नहीं दिया, तो जहर खाने के सिवाय हमारे पास दूसरा कोई रास्ता नहीं बचेगा।‘
पास में खड़े कृष्णबदर गुस्से में कहते हैं, ‘सरकार मुसलमानों को सबक सिखाने के चक्कर में हिंदुओं का बुरा कर रही है। कुर्बानी मुसलमान देते हैं, लेकिन इसका व्यापार तो हिंदू ही कर रहे हैं। गांव में सभी दलित हिंदुओं ने कुर्बानी के वक्त बेचने के लिए 8 से 10 गाय और बकरियां पाली हैं। सालभर इन्हें दाना-पानी दिया, ताकि मुनाफा कमा सकें।‘
‘पशु खरीदने और पालने के लिए बैंक से 10 लाख रुपए लोन लिया था। अब सरकार बताए कि ये कैसे भरें। पशुओं को दाना-पानी कैसे खिलाएं।‘

